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सावन बरस मेह अति पानी

सावन पर जितने गीत, ग़ज़ल और गाने लिखे गए वह शायद ही किसी माह के लिए लिखे गए हो। काव्य के लिए यह सबसे उर्वरित माह है जब मन के भीतर से कविता आती है चाहे वह मिलन की हो या विरह की।

Gaurav Gautam

गौरव गौतम

22 सितंबर 2026·10 मिनट पठन
सावन बरस मेह अति पानी
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सावन मनभावन अकाट्य सत्य की तरह है। यह माह मन को भाए भी क्यों न। बादल की आग और उसके राग से चित्त एकाकार हो जाता है। पपीहे पी पी और मेढ़क टर्र टर्र कर अपना मल्हार गाते है। आषाढ़ में बादल धरती को जल से आप्लावित कर देते है। बादलों की झम-झम और भूमि में बूँदों की छम छम का संगीत मधुर और कर्णप्रिय होता है। यह प्रकृति के यौवन के आरंभ का माह है। सावन में वर्षा ऋतु का बालपन और कैशोर्य ख़त्म होता जाता है। वह युवान्वित होती है जिसका प्रतिरूप प्रकृति में दिखता है जो ऊर्जावान,हर्षित और चहकती हुई होती है। मरु प्रदेश भी नंदन कानन लगता है। ताल, तलैया, नदी, झरने सभी भरे ही नहीं होते छलकते होते है जिनसे कुलकुल कलकल की मनमोहक आवाज़ आती है। किंतु जब इनका प्रसार अनियंत्रित होता है तो बाढ़ के भयावह दृश्य भी दिखते है। युवापन को भी जब संरक्षण और संवर्धन नहीं मिलता तब वह अनियंत्रित और मर्यादाहीन हो जाता है। उसकी वाणी में कोयल की कुहुक नहीं होती। उसके शब्दों में कर्कशता होती है। सावन यही बताता है व्यक्ति प्रकृति की लय में रहे तभी वह भीतर से उत्फुल्ल हो सकता है अन्यथा षट्पदों की तरह वह गंदगी में ही पनपेगा।

सावन में मानव का मन भी प्रफुल्लित, उत्साहित और उत्कंठित होता है। इस माह किसान धान की फसल के रूप में उम्मीद का रोपा लगाता है। जिससे उसका जीवन मधुमय हो। कालिदास ने भी मेघ से कहा है कि किसान की फसल वर्षा पर ही निर्भर है। गाँव की स्त्रियाँ तुम्हारी ओर आशा भरी दृष्टि से निहार रही है। वहाँ बहुत आराम से आगे बढ़ते हुए खूब बारिश करना।

त्वय्यायत्तं कृषिफलमिति भ्रूविलासानभिज्ञैः प्रीतिस्निग्धैर्जनपदवधूलोचनैः पीयमानः। सद्यःसीरोत्कषणसुरभि क्षेत्रमारुह्य मालं किंचित्पश्चाद्व्रज लघुगतिः भूय एवाभिवृष्टम्॥

दृष्टि वाले इस माह बादल को घिरते हुए देख लेते है। जिनके चक्षु में धुंध हो उन्हें तो कुछ भी नहीं दिखता। भले कोई भी ऐनक लगा ले। प्रकृति का वेश लगातार बदलता रहता है। वह सपंन्नता दिखाते हुए नए नए परिधान धारण करती रहती है। नीम और आम की डाल पर झूला पड़ता है जिस पर बैठ दोलायमान हुए होते कंठ से कजरी का गान निकलता है जिसमें मायके की याद और प्रिय की स्मृति होती है

सावन में लागल बदरिया घनघोर, पिया परदेसवा में, भींजे मोरा जियरा। झूला पड़े अमवा की डार, सखी चलऽ झूलनवा झूलऽ, सावन आयो बहार।

भारतीय मन में चाहे संयोग की स्थिति हो चाहे वियोग की। उल्लास हो या अवसाद। हर महीने, हर क्षण राधा-माधव उसके चित्त में ही होते है। सावन आने पर जब कदंब की डाल पर झूला पड़ता है तो वह राधिका- कन्हाई का सुमिरण करता है कि

झूला पड़े कदम्ब की डार, झूले राधा-कृष्ण मुरारि, सावन आयो रे।

तुलसीदास भी धरा-धाम में सावन में ही आए। इसी माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को तुलसीदास का जन्म होता है जिन्हें विधि ने जगत की भलाई के लिए भेजा था। राम की कथा को जन-जन के कंठ तक पहुँचाने के लिए। नाभदास जी ने ठीक ही कहा कि “कलि कुटिल जीव निस्तार हित बाल्मीकि तुलसी भयौ” यानी बाल्मीकि ने कलयुग में तुलसीदास के रूप में देह धारण कर रामकथा का गायन किया। तुलसीदास को उनके जन्म का महीना बड़ा प्रिय था तभी उन्होंने राम नाम के सुंदर अक्षर की तुलना सावन और भादों मास से की- राम नाम बर बरन जुग सावन भादव मास॥

यह माह राम के आराध्य शिव का माह है जब शिव मंदिरों में निरंतर घंटे-घड़ियाल की ध्वनि गुंजरित होती है। इस माह शिव नीलकंठ के रूप में होते है। नए चारे कर कारण जो दूध मानव के लिए पोषकयुक्त नहीं होता उसे शिव धारण करतें है।

सावन का सोमवार सिर्फ़ एक दिन बस नहीं होता यह श्रद्धा और विश्वास की आस होता है। रिश्तों के मध्य यह आस बहुत मुरझाइ हुई है जिससे व्यक्ति के भीतर सावन नहीं आ पाता है। शिव एक भरोसा देते है एक पथ जिस पर चलकर विरोध में सामंजस्य होता है जिसका प्रतिनिधित्व शिव-परिवार करता है। सावन के सोमवार को भगवान शिव से सुखमय, प्रेमिल भविष्य का निवेदन होता है।

सावन में धरती में सर्वत्र मखमल सी कोमल हरियाली होती है। संभवतः इसी को देख बंकिम को ‘शस्यश्यामलाम्’ की याद आयी होगी जब भूमि, तृण, संकुल सभी हरे होते है। जिनको देश का भाव समझ नहीं आता उन्हें इस राष्ट्रीय गीत से भी परेशानी होती है। सावन में भी उनको हरा नहीं दिखता। इस महीने तो बबूल के पेड़ में भी पीले फूल आ जाते है पर कुछ लोगों के भाव काँटों से भी कठोर होते है जहाँ कोई सुमन नहीं खिलता। किसी भी कली का विकसन नहीं होता। वह पाखंड वाद के फेर में पड़कर सद्ग्रंथ की ओर उन्मुख ही नहीं होते है

सावन संयम का महीना है। खान-पान, विचार सभी में संयम बरतने की परंपरा है। तामसिक भोजन और हरी पत्तेदार सब्जी के सेवन से बचा जाता है। वातावरण में सूक्ष्मजीव बढ़ने से दही खाने का भी निषेध किया जाता है। सावन कहता है त्यागपूर्वक भोग करो तभी जीवन आनंदमय होगा। उसमें रोमांचित गान होगा।

सावन पर जितने गीत, ग़ज़ल और गाने लिखे गए वह शायद ही किसी माह के लिए लिखे गए हो। काव्य के लिए यह सबसे उर्वरित माह है जब मन के भीतर से कविता आती है चाहे वह मिलन की हो या विरह की। प्रिय के परदेश में होने से सावन की लडी सीने में आग ही लगाती है जिसकी अभिव्यक्ति फिल्मी गाने -चाहे वह “सावन का महीना पवन करे शोर”हो या “रिमझिम गिरे सावन” हो- से होती है। सावन की रिमझिम बूँदे भिंगाने के साथ-साथ ‘अगन’ भी लगाती है। जो गर्माती भी है और झुलसाती भी है। जब प्रिय साथ हो तपन से उसे पिघलाकर एकाकार करती है जब दूर हो तो व्यक्ति भीतर ही भीतर सुलगता है। जायसी की नागमती को यही शिकायत है कि उसका पति उसके साथ नहीं किसी पद्मिनी यानी सुंदर नारी की चाहत में दर दर भटक रहा है। जैसे सावन में बाग में झूले डोलते है वैसे ही उसका हृदय भी डोलता है। सावन का पानी धरती की प्यास को तृप्त कर देता है पर उसका मन विरह के कारण सूखा ही होता है। यह विरह वाणी शहर, गाँव के अधिकांश घर में सुनी जाती है। इस महीने मौन भी मुखर होता है। पावस का अंधेरा, गगन की गर्जन, दादुर की आवाज़ जहाँ भय उपजाते है वहीं जुगनू की द्युति आशा देती है कि तिमिर के बाद भोर आने वाली है।